देख रहे हो तारणहारे !
इंसाँ फिर इंसाँ को मारे।
दिल में पत्थर-दिल को रखकर,
निर्धन माई, रोगी बच्चा,
कब तक फिरते मारे-मारे
वो तो मुझ को छोड़ चुकी है,
मैं ही सावन का अंधा रे
जो अन्दर से ही बिखरा हो,
वो क्या तेरे बाल सँवारे
मेरी क़ब्र पे फूल चढ़ाकर,
मुझको फिर से मार दिया रे
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